दत्तात्रेय आरती
त्रिमूर्ति दत्तात्रेय
दत्तात्रेय की आरती – 'जय देव जय देव जय श्री गुरुदेवा' का पूर्ण पाठ, विधि, लाभ और दत्त जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) पूजन सहित।
दत्तात्रेय आरती का परिचय
दत्तात्रेय की प्रसिद्ध आरती "जय देव जय देव जय श्री गुरुदेवा" भारतीय भक्ति परंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है। ब्रह्मा-विष्णु-महेश के एकत्रित अवतार दत्तात्रेय की आरती।
आरती का अर्थ है – संपूर्ण श्रद्धा से दीप दिखाकर देवता की स्तुति करना। यह शब्द संस्कृत "आरार्तिका" से बना है। दैनिक पूजा में सुबह-शाम आरती करने की परंपरा है।
दत्तात्रेय का स्वरूप
दत्तात्रेय तीन मुख (ब्रह्मा-विष्णु-शिव), छह भुजाओं में कमंडल-माला-पुस्तक-शंख-चक्र-त्रिशूल। चार कुत्ते (चार वेद) और गाय साथ। प्रिय – सफेद पुष्प, पंचामृत।
आरती करने की विधि
- स्थान: दत्तात्रेय की मूर्ति के सामने पूर्व/उत्तर दिशा में खड़े हों।
- सामग्री: पीतल की आरती थाली, घी/तेल, कपूर, रूई बत्ती, पुष्प।
- दीप प्रज्वलन: दीप में 5 या 1 बत्ती जलाएं।
- शुरुआत: घंटी बजाते हुए मंत्र जप से शुरू करें।
- आरती गायन: दीप को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाते हुए गाएं।
- क्रम: चरणों पर 4 बार, नाभि 2 बार, मुख 3 बार, शरीर 7 बार।
- समापन: पुष्पांजलि, परिक्रमा, भोग और प्रसाद।
विस्तृत नियम आरती विधि में देखें।
दत्तात्रेय आरती कब करें?
- दत्त जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) का दिन विशेष शुभ।
- दैनिक: सुबह (मंगल आरती) और शाम (संध्या आरती)।
- शुभ कार्य से पहले: गृह प्रवेश, विवाह, नई शुरुआत पर।
- त्यौहार: देवता से संबंधित विशेष पर्वों पर।
आरती के लाभ
- मानसिक शांति: एकाग्रता और तनाव से मुक्ति।
- घर में सकारात्मकता: नकारात्मक ऊर्जा का नाश।
- देवता की कृपा: सच्ची भक्ति से मनोकामना पूर्ति।
- परिवार में एकता: सामूहिक आरती बंधन बढ़ाती है।
- स्वास्थ्य लाभ: कपूर और घी के दीप से वातावरण शुद्ध।
- आध्यात्मिक विकास: नियमित भक्ति से चेतना का विकास।