गंगा मैया आरती

जय गंगे माता

माँ गंगा की आरती – 'ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता' का पूर्ण पाठ, विधि, लाभ और गंगा दशहरा, कार्तिक पूर्णिमा पूजन सहित।

माँ गंगा आरती का परिचय

माँ गंगा की प्रसिद्ध आरती "ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता" भारतीय भक्ति परंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है। हरिद्वार, वाराणसी और ऋषिकेश की गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है।

आरती का अर्थ है – संपूर्ण श्रद्धा से दीप दिखाकर देवता की स्तुति करना। यह शब्द संस्कृत "आरार्तिका" से बना है। दैनिक पूजा में सुबह-शाम आरती करने की परंपरा है।

माँ गंगा का स्वरूप

माँ गंगा श्वेत वर्ण, श्वेत वस्त्र, मकर वाहन, कमंडल-कमल धारी, मस्तक पर चंद्रमा। प्रिय – श्वेत पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, फल।

आरती करने की विधि

  1. स्थान: माँ गंगा की मूर्ति के सामने पूर्व/उत्तर दिशा में खड़े हों।
  2. सामग्री: पीतल की आरती थाली, घी/तेल, कपूर, रूई बत्ती, पुष्प।
  3. दीप प्रज्वलन: दीप में 5 या 1 बत्ती जलाएं।
  4. शुरुआत: घंटी बजाते हुए मंत्र जप से शुरू करें।
  5. आरती गायन: दीप को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाते हुए गाएं।
  6. क्रम: चरणों पर 4 बार, नाभि 2 बार, मुख 3 बार, शरीर 7 बार।
  7. समापन: पुष्पांजलि, परिक्रमा, भोग और प्रसाद।

विस्तृत नियम आरती विधि में देखें।

माँ गंगा आरती कब करें?

आरती के लाभ

संबंधित पाठ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

माँ गंगा की आरती कब करें?
गंगा दशहरा, कार्तिक पूर्णिमा सर्वोत्तम। दैनिक सुबह-शाम दो बार। विशेष अवसरों पर विशेष आरती। दीप दान विधि देखें।
आरती से पहले क्या करें?
चालीसा या मंत्र जप करें। गंगा चालीसा पढ़ने के बाद आरती करने की परंपरा है।
आरती कितनी बार दोहराएं?
सामान्यतः 3 बार। पारिवारिक परंपरा अनुसार 5, 7 या 11 बार।
क्या महिलाएं आरती कर सकती हैं?
हां, पूर्ण अधिकार है। महिलाओं के पूजा नियम देखें।
आरती के बाद क्या करें?
कपूर जलाकर सुगंध फैलाएं, दीप की लौ पर हाथ रखकर माथे पर लगाएं, तीन परिक्रमा, भोग और प्रसाद।
आरती में तुलसी कब चढ़ाएं?
विष्णु-राम-कृष्ण को तुलसी प्रिय है। शिव-गणेश को वर्जित। पूजा में क्या न करें देखें।

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