विश्वकर्मा आरती

विश्वकर्मा जी की आरती

भगवान विश्वकर्मा की आरती – 'ओम जय श्री विश्वकर्मा' का पूर्ण पाठ, विधि, लाभ और विश्वकर्मा जयंती (17 सितंबर) पूजन सहित।

भगवान विश्वकर्मा आरती का परिचय

भगवान विश्वकर्मा की प्रसिद्ध आरती "ओम जय श्री विश्वकर्मा" भारतीय भक्ति परंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है। देव-शिल्पी की आरती – कारखानों, मशीनों और औजारों की पूजा में विशेष।

आरती का अर्थ है – संपूर्ण श्रद्धा से दीप दिखाकर देवता की स्तुति करना। यह शब्द संस्कृत "आरार्तिका" से बना है। दैनिक पूजा में सुबह-शाम आरती करने की परंपरा है।

भगवान विश्वकर्मा का स्वरूप

विश्वकर्मा चार भुजाओं में जलपात्र, पुस्तक, फंदा, औजार। श्वेत दाढ़ी, मुकुट, हंस वाहन। कुछ चित्रों में पाँच मुख।

आरती करने की विधि

  1. स्थान: भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति के सामने पूर्व/उत्तर दिशा में खड़े हों।
  2. सामग्री: पीतल की आरती थाली, घी/तेल, कपूर, रूई बत्ती, पुष्प।
  3. दीप प्रज्वलन: दीप में 5 या 1 बत्ती जलाएं।
  4. शुरुआत: घंटी बजाते हुए मंत्र जप से शुरू करें।
  5. आरती गायन: दीप को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाते हुए गाएं।
  6. क्रम: चरणों पर 4 बार, नाभि 2 बार, मुख 3 बार, शरीर 7 बार।
  7. समापन: पुष्पांजलि, परिक्रमा, भोग और प्रसाद।

विस्तृत नियम आरती विधि में देखें।

भगवान विश्वकर्मा आरती कब करें?

आरती के लाभ

संबंधित पाठ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवान विश्वकर्मा की आरती कब करें?
विश्वकर्मा जयंती (17 सितंबर) सर्वोत्तम। दैनिक सुबह-शाम दो बार। विशेष अवसरों पर विशेष आरती। विश्वकर्मा पूजा विधि देखें।
आरती से पहले क्या करें?
चालीसा या मंत्र जप करें। विश्वकर्मा चालीसा पढ़ने के बाद आरती करने की परंपरा है।
आरती कितनी बार दोहराएं?
सामान्यतः 3 बार। पारिवारिक परंपरा अनुसार 5, 7 या 11 बार।
क्या महिलाएं आरती कर सकती हैं?
हां, पूर्ण अधिकार है। महिलाओं के पूजा नियम देखें।
आरती के बाद क्या करें?
कपूर जलाकर सुगंध फैलाएं, दीप की लौ पर हाथ रखकर माथे पर लगाएं, तीन परिक्रमा, भोग और प्रसाद।
आरती में तुलसी कब चढ़ाएं?
विष्णु-राम-कृष्ण को तुलसी प्रिय है। शिव-गणेश को वर्जित। पूजा में क्या न करें देखें।

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