1. Mindfulness

Tulsidas Ke Dohe – तुलसीदास जी के लोकप्रिय दोहे, हिंदी में।

तुलसीदास जी के लोकप्रिय और दिलचस्प दोहे, एकदम सटीक और सरल हिंदी अर्थ सहित। पढ़ें तुलसीदास की वाणी और इनसे ज़िन्दगी जीने के गुण सीखें।

आज हम UP के एटा में जन्मे एक महान कवी की बात करेंगे। मन मोहक कविताओं के धनि जो अपनी वाणी से ज़िन्दगी जीने का हुनर सिखाते थे।

जिन्हे रामायण के रचियता महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है, ऐसी महान शख्सियत का नाम है, गोस्वामी तुलसीदास जी (Goswami Tulsidas Ji).

एक दिन बहुत बारिश और अँधेरी रात होने के बावजूद तुलसीदास जी अपनी पत्नी रत्नावली से मिलने उनके ससुराल पहुंच गए। यह सब देखकर उनकी पत्नी दंग रह गई। पत्नी ने उन्हें राम नाम जपने का ताना दे दिया और वहा से तुलसीदास “गोस्वामी तुलसीदास जी” बन गए।

रत्नावली ने ऐसा क्या कहा:

अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति नेक जो होती राम से, तो काहे भव-भीत

अर्थ: मेरा शरीर तो चमड़े का बना है जो एक दिन नष्ट हो जायेगा। इस नष्ट हो जाने वाले शरीर से प्रेम करो उससे अच्छा है की तुम राम नाम का जाप करो तो तुम्हारा कल्याण हो जाता।

उस दिन से तुलसीदास जी राम भक्ति में डूब गए और कई किताबे लिख दी जिनमे रामचरितमानस भी है।

तो दोस्तों, आज हम तुलसीदास जी के दोहे अर्थ सहित बताने जा रहे है, इसे अंत तक ज़रूर पढ़ें और प्रेरणा लें।

संत तुलसीदास के दोहे हिंदी अर्थ सहित।

(Sant Tulsidas Ke Dohe Hindi Mein)

तेजहीन व्यक्ति की बात पर कोई ध्यान नहीं देता, उसकी बात कोई नहीं मानता। जैसे राख की आग जब बूझ जाती है तो सब उसे चुने लगते है।

संत तुलसीदास जी कहते है की मुसीबत के समय यह चीज़े बहुत काम आती है, जैसे शिक्षा, विनम्रता, विवेक, साहस, सुकृति और हमारा अपना सत्य। साथ ही राम पर हमारा विश्वास।

इंसान के मन में जब तक काम, क्रोध, अहंकार और लालच होती है, तब तक एक विद्वान् और एक मुर्ख में कोई फर्क नहीं। दोनों एक सामान है।

जिस घर में जाने पर आपको देखके लोग खुश ना हो और उनकी आखों में प्रेम ना दिखाई पड़े तो ऐसे घर में कभी ना जाये, चाहे वहा पैसो की बारिश ही क्यों ना हो रही हो।

तुलसीदास कहते है की हे रघुवीर मेरे जैसा को दीनहीन नहीं और तुम्हारे जैसा को दीनहीन का भला करने वाला कोई नहीं। ऐसा विचार के हे रघुवंष मेरे जन्म-मृत्यु के भय को हर लो।

जैसे कामना से भरे व्यक्ति को औरत प्यारी लगती है, जैसे लालची व्यक्ति को दौलत प्यारी लगती है वैसे ही हे रघुनाथ, हे राम आप मुझे प्यारे लगते हो।

तुलसीदास कहते है की राम एक छोटे से मच्छर को प्रभु बना सकते है और प्रभु को छोटा सा मच्छर भी बना सकते है। ऐसी समझ रखने वाले विद्वान् लोग सारी आशंकाए त्यागकर राम की ही भक्ति करते है।

ऐसा कुल जिसमे राम की भक्ति करने वाले लोग जन्म लेते हो वो कुल धन्य है और दुनिया के लिए पूजनीय है।

बुरी संगत में रहने से लोग बदनाम ही होते है और वो अपनी इज़्ज़त खो देते है, जैसे देवी-देवताओ का नाम रखकर बुरी संगत में रहे तो उन पावन नामो को कोई असर नहीं होता।

गलत संगत में रहने वाला इंसान अपने काम में सफलता की उम्मीद करता है तो उसे कभी सफलता नहीं मिलती। ठीक उसी तरह जैसे मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम गया पद गया।

जो लोग इंसान का शरीर पाकर भी राम भक्ति नहीं करते और दुनिया के मोह में खोये रहते है, वो ऐसे मुर्ख इंसान जैसे है जो पारस मणि को फ़ेंक देते है और कांच का टुकड़ा उठा लेते है।

परिवार में बड़े को मुँह जैसा होना चाहिए, वो खाता-पिता अपने मुख से है और शरीर के सभी अंगो का अपनी बुद्धी से पोषण करता है।

जो लोग दुसरो की निंदा करके खुद अपने लिए सम्मान ढूंढ़ते है वैसे लोगो के मुँह पर ऐसी कालिख लग जाती है जो लाखों बार धोने पर भी नहीं मिट सकती।

किसी की मीठी बोली या सुन्दर कपड़ों से उनके भीतर की भावना कैसी है यह जान नहीं सकते। सूपनखा, मारीच, पूतना और रावण यह सभी सुन्दर वस्त्र पहनते थे पर मन से मैले थे।

किसी इंसान के अच्छे और उम्दा कपडे देखकर सिर्फ बेवक़ूफ़ ही नहीं, बल्कि बुद्धिमान इंसान भी धोका खा सकते है। बिलकुल उसी तरह जैसे मोर के पंख सुन्दर और उसकी वाणी मीठी लगती है पर उसका भोजन सांप होता है।

कोई सलाहकार, कोई चिकित्सक या कोई गुरु जब झूठ बोलने लगते है तब धर्म और शरीर का नाश निश्चित है।

भगवन एक ही है, उन्हें कोई इच्छा नहीं होती और उनका कोई रूप या नाम नहीं। उनका जन्म नहीं हुआ, वे परमानन्द है। उस विश्वरूप भगवन ने अनेक चेहरे और अनेक शरीर धारण कर रखे है।

भगवन अपने भक्तो के लिए ही अपनी कृपा बरसाते है। वे परम कृपालु और भक्त के दोस्त है। वे केवल प्रेम करते है और किसी पर क्रोध नहीं करते।

जब कोई भक्त संकट के वक्त भगवान को याद करता है तो भगवान उनकी मदद ज़रूर करते है, इससे भक्त सुखी हो जाते है। अर्थाथ; आर्त; जिज्ञासु और ज्ञानी यह चार प्रकार के भक्त है जो पुण्य के भागी होते है।

जो अपनी सभी इच्छाओ को छोड़कर बस राम की भक्ति में लीन होते है वे प्रेम के सागर में अपने मन को मछली की तरह रखते है और कभी भी अलग नहीं होना चाहते वही सच्चे भक्त है।

संत तुलसीदास जी की अमृतवाणी। 

अनेक तरीको से भक्ति करना और क्षमा, दया, दम लताओं के मंडप समान है। ईशवर के चरणों में प्रेम भक्ति का रस है और यह वेदों में लिखा हुआ है।

भगवान को न समझने पर झूठ आपको सत्य जैसा लगता है जैसे बिना रस्सी को पहचाने वह आपको सांप जैसी लगती है। लेकिन भगवान को जान लेने पर संसार का उसी तरह सच समझ आता है जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम टूट जाता है।

जिसने अपने कानो द्वारा प्रभु की कथा नहीं सुने उसके कान का छेद सांप के बिल जैसा है।

जिस इंसान के दिल में भगवान की भक्ति नहीं वह ज़िंदा होकर भी मुर्दा के समान है और जिसने भगवान का गुण नहीं गाया उसकी ज़बान मेंढक की जीभ समान है।

तुलसीदास कहते है की उसका दिल कठोर और निठुर है जिनका दिल भगवान का चरित्र सुनकर भी प्रसन्न नहीं होता।

तुलसीदास जी के अनुसार सुगुण और निर्गुण में कोई अंतर नहीं। मुनि पुराण पन्डित बेद सबका यह मानना है की जो निर्गुण है वही भक्तो के प्रेम के कारण सुगुण है।

भगवान अनंत है, उनकी कथाएं भी अनंत है। भक्त जन उन्हें अनेक प्रकारों से जानते है और वर्णन करते है। करोडो युगो में भी श्री राम का सुन्दर चरित्र नहीं गाया जा सकता है।

तुलसीदास जी कहते है की प्रभु को सबकुछ पता है। दुनिया को प्रसन्न करके कभी सिद्धि प्राप्त नहीं होती।

तपस्या से भगवान ने इस संसार की रचना की, तपस्या से विष्णु संसार का पालन करते है। तपस्या से शिव संसार का संहार करते है, तपस्या से संसार का हर काम किया जा सकता है।

भगवान हमेशा मौजूद है। देश, विदेश और सभी दिशाओ में मौजूद है। उन्हें प्रेम से बुलाने पर वो प्रगट हो जाते है। प्रभु कहाँ मौजूद नहीं ये कहा नहीं जा सकता।

भगवान पूर्णकाम भक्तो के शिरोमणि और सज्जनो के प्यारे है। वह भक्तो के गुण गाहक और बुराइयों का नाश करने वाले और दयालु है।

जॉब योगी अपने प्रभु के लिए क्रोध, मोह, ममता और अहंकार का त्याग करदेता है। वो सर्वव्यापक ब्रह्म अब्यक्त अविनासी चिदानंद निर्गुण और गुणों की खान बन जाता है।

जिसका पुरे मन से शब्दों में उल्लेख नहीं किया जा सकता, जिसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता, जिसकी महिमा को वेदों में नेति कहा गया है और वो एकरस है।

दोस्ती पर कवी तुलसीदास के दोहे।

(Friendship Par Kavi Tulsidas Ke Dohe)

तुलसीदास कहते है की जो अपने दोस्त के दुःख से दुखी नहीं होता उसे देखने से भी भरी पाप लगता है। हमें अपने पहाड़ समान दुःख को छोटा और दोस्तों के धूल बराबर दुःख को पहाड़ समान समझना चाहिए।

जिनके अंदर इस प्रकार की बुद्धि न हो वो ज़िद करके दोस्त बनाता है। सच्चा दोस्त आपको गलत रास्ते पर जाने से रोकता है और सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करता है। वह आपके अवगुण छुपाकर सिर्फ गुणों को गिनाता है।

अपने दोस्त के साथ लेन-देन में ना घबराये, अच्छे मित्र के साथ हमेशा भलाई करें। संकट के समय वह सौ गुण स्नेह प्रेम करता है, यही एक अच्छे मित्र के गुण है।

जो आपके सामने बाते बना-बनाकर मीठा बोलता है पर उसके मन के अंदर बुरी भावना रखता है, जिसका मन सांप की तरह टेड़ा चलता है ऐसे दोस्त से दोस्ती ना रखने में ही भलाई है।

इस संसार में दुश्मन, दोस्त, सुख, दुःख, माया और झूठे है पर वास्तव में यह सब नहीं है।

सब अपने स्वार्थ के लिए ही प्रेम करते है, चाहे वो देवता हो, इंसान हो या मुनि हो.

संगती पर तुलसीदास की रचनाये।

(Sangati Par Tulsidas Ki Rachnaye)

ख़राब सांगत में रहना बहुत ही बुरा रास्ता है, कुसंगियों के बोल बाघ, सिंह और सांप जैसे है। घर के कामकाज के अनेक झंझट ही एक विशाल पहाड़ की तरह है।

गंगा में शुद्ध और अशुद्ध दोनों प्रकार का जल बहता है पर कोई उसे अपवित्र नहीं कहता। सूरज, आग और गंगा की तरह समर्थ इंसान को कोई दोष नहीं लगाता।

बड़े हमेशा छोटो से प्रेम करते है। पहाड़ के सर पर हमेशा घास रहती है, समुद्र में फैन जमा रहता है और धरती के ऊपर हमेशा धूल रहती है।

अगर गरुड़ के हिस्सा कौआ मांगे, सिंह का हिस्सा खरगोश मांगे। बिना किसी कारण क्रोध करने वाला कुशलता मांगे, शिव विरोधी संपत्ति मांगे, लोभी अच्छी कीर्ति मांगे और कामी इंसान बदनामी नहीं चाहे तो इन सब की इच्छाए व्यर्थ है।

घर, दवाई, पानी और हवा यह सब कुसंगित और सुसंगीत पाकर बुरे या अच्छे बन जाते है। ज्ञानी और विद्वान् लोग ही इसकी पहचान कर सकते है।

संगती से सभी का नाश हो जाता है। नीच लोगो के अनुसार चलने से चतुराई और बुद्धि दोनों भ्रष्ट हो जाती है।

अगर तराज़ू के एक पलड़े में स्वर्ग के सभी प्रकार के सुख को रखा जाए तब भी वो एक पल के सत्संग से मिलने वाले सुख के बराबर नहीं होता।

तुलसीदास यहाँ असंतो के गुण बता रहे है। वे कहते है की कभी भूलकर भी असंतो की संगत में ना रहे, उनकी संगती से हमेशा नुक्सान होता है। ख़राब गाय के साथ अगर अच्छी दुधारू गाय को रखा जाए तो अच्छी गाय में वो खराबी आ जाती है।

दुर्जन के दिल में हमेशा संताप रहता है, दुसरो मो सुखी देखकर उन्हें जलन होती है। वह दुसरो की बुराई सुनकर बड़े खुश होते है जैसे रास्ते में पड़ा कोई खज़ाना न मिल गया हो।

वो काम, क्रोध, अहंकार और लोभ में डूबे होते है, वो निर्दयी और कपटी होते है। बिना किसी कारण वो दूसरों से दुश्मनी रखते है और जो भलाई करता है उससे बुराई करते है।

दुष्ट का लेन-देन सब झूठा होता है। उनका नाश्ता, भोजन सब झूठ ही होता है जैसे मोर बहुत मीठा बोलता है पर वो इतना कठोर होता है की ज़हरीले सांप को भी खा जाता है।

तुलसीदास के दर्शनिक विचार।

(Tulsidas Ke Darshanik Vichar)

वो लोग दुसरो के द्रोही होते है, पराया धन और परायी स्त्री की निंदा में लगे रहते है। ऐसे इंसान पामर और पापमय शरीर में राक्षश होते है।

लोभ लालच ही उनका ओढ़ना, बिछाना होता है। वे जानवर के जैसे भोजन और मैथुन करते है। उन्हें यमलोक का कोई दर नहीं, उन्हें दुसरो की प्रशंशा सुनकर मानो बुखार चढ़ जाता है।

दूसरों को मुसीबत में देखकर वे खुश होते है। अपने मतलब में लीन वो अपने परिवार के सभी लोगो के विरोधी होते है। काम वासना और लोभ में लिप्त वो अति क्रोधित होते है।

ऐसे लोग माता-पिता और गुरु में नहीं मानते। खुद तो नष्ट रहते है  दुसरो को भी अपनी संगती में लेकर उन्हें बर्बाद कर देते है। अपने मतलब के लिए दूसरों से द्रोह करते है। ऐसे लोगो को संतो की संगती और ईश्वर की कथा पसंद नहीं आती।

दुर्गुणों का दरिया, मंदबुद्धि, काम वासना में लिप्त ज़बरदस्ती वेदों की निंदा करने वाले और दुसरो का धन लूटने वाले। उनका दिल घमंड और छल से भरा होता है पर उनके कपडे सुन्दर होते है।

भक्ति स्वतंत्रन रूप से सभी सुखों की खान है पर बिना संतो की संगत के भक्ति नहीं मिल सकती। पुण्य किये बिना संतो की सांगत नहीं मिलती और संतो की सांगत ही जीवन-मरण के चक्कर से छुटकारा है।

नीच इंसान को जिससे बड़प्पन मिलता है वो सबसे पहले उसीका नाश कर देता है। जब आग से धुआँ निकलता है तो धुआँ मेघ बनकर सबसे पहले आग को ख़तम कर देता है।

धुल रास्ते पर निरादर पड़ी रहती है और सभी के पैरो की चोट सहती रहती है लेकिन हवा के उड़ने पर सबसे पहले वो हवा में भर जाती है फिर राजाओ के मुकुट और आखों पर पड़ती है।

समझदार लोग नीच लोगो की संगत में नहीं रहते। कवी और पंडित कहते है की नीच लोगो से ना झगड़ा अच्छा और नाही प्रेम।

नीच से हमेशा उदासीन ही रहना चाहिए। कुत्ते की तरह नीच को दूर से ही भगा देना चाहिए।

कुछ लोग जुट की तरह दूसरों को बांधते है और जुट में बाँधने में लिए अपनी खाल तक खिचवाते है। वह दुःख सहकर मर जाता है। नीच लोग बिना स्वार्थ के सांप और चूहे की तरह दुसरो पर अपकार करते है।

वे दूसरों को बर्बाद कर खुद भी नष्ट हो जाते है, जैसी खेती को बर्बाद करके ओला खुद नष्त्य हो जाता है। दुष्ट का जन्म संसार के दुःख के लिए होता है।

आत्मा अनुभव पर तुलसीदास जी के दोहे।

(Aatma Anubhav Par Tulsidas Ji Ke Dohe)

इस संसार में अनेक प्रकार के दुःख है परन्तु सबसे बड़ा दुःख जाती अपमान है।

समझदार दुश्मन अगर अकेला भी हो तो उसे कमज़ोर नहीं समझना चाहिए। राहु का सिर्फ सिर बच गया था परन्तु आज भी वो सूरज और चाँद को ग्रसित करता है।

तुलसीदास जी कहते है की जब ईश्वर का स्मरण नहीं होता तब धूल पर्वत के समान, पिता काल के समान और रस्सी सांप के समान लगती है।

अच्छे गुरु का स्वाभाव ऐसा होता है की वो सेवक को पहले दंड देकर फिर उसपर कृपा करता है।

सुख, धन, संपत्ति, संतान, सेना, मददगार, विजय, प्रताप, बुद्धि, शक्ति और प्रशंसा जैसे जैसे यह सब बढ़ते जाते है वैसे ही लोभ भी बढ़ता जाता है।

ऐसे वीर जो युद्ध से कभी नहीं भागते, परायी स्त्री पर कभी नज़र नहीं डालते, जिनके द्वार से भिखारी कभी खाली हाथ नहीं जाते ऐसे लोग दुनिया में बहुत कम है।

तुलसीदास जी कहते है की टेड़ा जानकर लोग किसी भी व्यक्ति की प्रार्थना करते है। टेड़े चाँद को राहु भी कभी ग्रसित नहीं करता।

सेवक के घर अगर स्वामी आते है तो घर में सबकुछ मंगल होता है और अमंगल घर से चला जाता है।

संत तुलसीदास कहते है – भरत की माँ कहती है की कानों, लंगरों और कुवरों को कुटिल और खराब चालचलन वाला जानना चाहिये।

कोई भी राजा बन जाए, हमारा क्या नुक्सान है।

दासी छोड़कर में क्या रानी बन जाऊ। वैसी हीं बुद्धि भी फिर बदल जाती है।

पहले वाली बाते अब गुज़र चुकी। समय आने पर दोस्त भी दुश्मन बन जाते है।

ईश्वर जिसे शत्रु की तरह ज़िंदा रखे उसे ज़िंदा रहने के बजाय मर जाना बेहतर है।

जो इंसान तलवार, त्रिशूल और बज्र जैसे हथियारों की मार अपने अंग पर सेह लेते है वो भी कामदेव के पुष्प बाण से मारे जाते है।

जाने कब क्या हो जाये, स्त्री पर विश्वास करके इंसान उसी प्रकार मारा जाता है जैसी योगी को सिद्धि मिलने के समय उसकी अविद्या उसे नष्ट कर देती है।

ठहाका मारकर हसना और साथ ही गुस्से से मुँह फुलाना यह एक साथ संभव नहीं। दानी और कृपण बनना, युद्ध में बहादुरी और चोट भी ना लग्न ये कभी संभव नहीं।

स्त्री का स्वभाव समझ के बाहर है, अथाह और रहस्य्मय है। कोई शायद अपनी परछाई को तो पकड़ ले पर स्त्री की चाल को नहीं समझ सकता।

आग किसे नहीं जला सकती? समुद्र में क्या क्या नहीं समां सकता? अबला नारी बहुत प्रबल होती है वो कुछ भी कर सकती है। काल किसे नहीं खा सकता है?

पति के बिना स्त्री के लिए लोगो का स्नेह सूर्य से भी ज़्यादा ताप देने वाला होता है। शरीर धन घर धरती नगर और राज्य यह सब स्त्री के लिए पति के बिना सिर्फ दुःख का कारण होता है।

भगवान अच्छे और बुरे कर्मो के हिसाब से दिल में फल विचार देता है। ऐसा वेद निति और लोग कहते है।

कोई दूसरा किसीको खुशियां या दुःख दे नहीं सकता। सबको अपने कर्मो का फल ही भुगतना पड़ता है।

मिलना और बिछड़ना, अच्छे बुरे फल, दुश्मन, दोस्त और तटस्थ ये सब भ्रम है। जन्म, मृत्यु, संपत्ति, विपत्ति कर्म और काल ये सभी इस संसार के जंजाल है।

एक नारी के दिल की चाल भगवान भी नहीं जान सकता। वह छल, कपट, पाप और अवगुणों का भण्डार होती है।

मुनिनाथ ने भरी दुःख के साथ भरत से कहा की ज़िन्दगी में फायदा-नुक्सान, जीवन, मृत्यु, प्रतिष्ठा यह सब ईश्वर के हाथ में होता है।

मुर्ख इंसान सांसारिक जीव पाकर मोह में पड़ जाते है और अपने असली स्वभाव को प्रकट कर देते है।

दुश्मन और ऋण को कभी भी बाकी नहीं रखना चाहिए। थोड़ी मात्रा में भी नहीं छोड़ना चाहिए।

धुल जैसी (नीच) हलकी चीज़ भी पैर मारने पर सर पर चढ़ जाती है।

किसी भी काम को उचित अनुचित के बारे में सोचकर किया जाए तो उसे अच्छा कहते है। वेद और विद्वान् लोग कहते है की जो काम जल्दी-जल्दी में बिना विचारे करके पछताए वो बुद्धिमान नहीं है।

वेदों के अनुसार इस दुनिया में तीन प्रकार के इंसान है। संसारी, साधक और सिद्ध इंसान।

अमृत तो सिर्फ सुनने की बात है, जहर तो हर जगह मौजूद है। कौआ, उल्लू और बगुला हर जगह मौजूद होते है पर हंस सिर्फ मानसरोवर पर ही रहते है।

ईश्वर की चाल बहुत ही विचित्र है। वह संसार का सर्जन करता है, उसका पालन करता है और उसका संहार भी कर देता है। ईश्वर की बुद्धि बच्चो जैसी भोली है।

सोना बहुत कसौटियों में कसने और हीरा जोहरी के द्वारा ही पहचाना जाता है। इंसान की परीक्षा समय आने पर उसके चरित्र से होती है।

बिना कारण दुसरो की मदद या भलाई करने वाले बुद्धिमान और श्रेष्ठ है यह कहना गलत है।

धैर्य, धर्म, दोस्त, और नारी की परीक्षा मुसीबत के समय होती है। बूढ़ा, रोगी, मूर्ख, गरीब, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यधिक गरीब यह सब का इम्तेहान ऐसे ही समय मे होता है।

अनेक पापो का भंडार है ये कलयुग जिसमे धर्म, ज्ञान, योग, तपस्या आदि कुछ नही बचा।

मैं और मेरा, तू और तेरा यही सब मोह माया है। जिसने सभी जीवों को वश में कर रखा है।

तुलसीदास कहते है कि दुश्मन, बीमारी, आग, पाप, स्वामी और सांप इन सबको कभी भी छोटा नही समझना चाहिए।

नीच इंसान की नम्रता बहुत ही पीड़ादायक होती है। जैसे अंकुश, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना। नीच की मीठी वाणी उसी तरह डरावनी होती है जैसे बिना मौसम के फूल।

बादलों के कारण कभी दिन में अंधेरा होजाता है तो कभी सूरज आ जाता है। जैसे कुसंग की संगत में ज्ञान नष्ट होजाता है और सुसंग की संगत में ज्ञान बढ़ जाता है।

सूरज का सेवन पीठ से और आग का सेवन छाती से करना चाहिए परन्तु स्वामी की सेवा छल कपट छोड़कर पुरे मन से करनी चाहिए।

संत की महानता ये है की वो बुरे करने वाले के साथ भी भलाई करते है।

साधू-संतो का अपमान तुरंत सभी तरह की भलाई का नाश कर देता है।

आलसी लोग ही भगवान-भगवान पुकारा करते है, वे खुद कोई मेहनत नहीं करते।

मुर्ख से नम्रता, दुष्ट से प्रेम और कंजूस से उदारता के बारे में सोचना ही व्यर्थ है।

मोह माया में फॅसे ब्यक्ति से ज्ञान की कहानी अधिक लोभी से वैराग्य का वर्णन क्रोधी से शान्ति की बातें और कामुक से ईश्वर की बात कहने का वैसा हीं फल होता है जैसा उसर खेत में बीज बोने से होता है।

करोड़ों उपाय करने पर भी केला काटने पर ही फलता है। नीच आदमी विनती करने से नहीं मानता है। वह डांटने पर ही झुकता है और रास्ते पर आ जाता है।

दुसरो को शिक्षा देने में सभी लोग बहुत अच्छे होते है। पर उस शिक्षा का पालन खुद नहीं करते।

संसार में तीन प्रकार के लोग होते है – गुलाब, आम और कटहल की तरह। एक फूल देता है-एक फूल और फल दोनों देता है और एक केवल फल देता है। लोगों मे एक केवल कहते हैं-करते नहीं। दूसरे जो कहते हैं वे करते भी हैं और तीसरे कहते नही केवल करते हैं।

जब किसीकी आखो में खराबी होती है तो उसे चन्द्रमा पीले रंग का दीखता है। जब पक्षी का राजा दिशा भूल जाता है तो उसे सूरज पश्चिम से उदय होता दिखाई पड़ता है।

नाव पर बैठा हुआ इंसान दुनिया को चलता दिखाई पड़ता है पर वह खुदको स्थिर समझता है। बच्चे गोल-गोल घूमते है पर घर नहीं घूमते। पर वो आपस में एक दूसरे को झूठा कहते है।

अगर किसी पिता के अनेक पुत्र हो तो पिता के अलग-अलग गुण सभी पुत्रो में होते है। कोई पंडित कोई तपस्वी कोई ज्ञानी कोई धनी कोई बीर और कोई दानी होता है।

कोई सब जानने बाला धर्मपरायण होता है।पिता सब पर समान प्रेम करते हैं। पर कोई संतान मन वचन कर्म से पिता का भक्त होता है और सपने में भी वह अपना धर्म नहीं त्यागता।

एक पुत्र पिता को बहुत प्यारा होता है, भले ही वो सभी तरह से मुर्ख क्यों न हो।

किसी की प्रभुता जाने बिना हमें उसपर विश्वास नहो होता, और विश्वास की कमी से प्रेम नहीं होता। प्रेम के बगैर भक्ति दृढ़ नहीं बन सकती जैसे पानी की चिकनाई नहीं ठहरती।

मैं ब्रम्ह हूँ – यह अनन्य स्वभाव की प्रचंड लौ है। जब अपने नीजि अनुभव के सुख का सुन्दर प्रकाश फैलता है तब संसार के समस्त भेदरूपी भ्रम का अन्त हो जाता है।

तुलसीदास कहते है की सच्चा ज्ञान कहने और समझने में बड़ा ही मुश्किल है और उसे साधना उससे भी ज़्यादा कठोर है। यदि सच्चा ज्ञान का बोध हो भी जाए तो उसे बचाकर रखने में अनेको बाधाएं है।

तुलसी जी कहते है की ज्ञान का रास्ता दुधारी तलवार के जैसा है, इस रास्ते पर भटकते देर नहीं लगती। जो इंसान बिना बढ़ा के इसे पार कर लेता है वो मोक्ष और परम पद को प्राप्त कर लेता है।

संसार में दरिद्रता के समान दुख एवं संतों के साथ मिलन समान सुख नहीं है। मन बचन और शरीर से दूसरों का उपकार करना यह संत का सहज स्वभाव है।

अज्ञानी सभी मुसीबतो का मूल है, इससे कई प्रकार के कष्ट होते है। काम वात और लोभ बढ़ा हुआ कफ है। क्रोध पित्त है जो हमेशा हृदय जलाता रहता है।

तो ये थे तुलसीदास जे के दोहे (Tulsidas Ke Dohe) इनके के हर एक दोहे में गहरा संदेश और मर्म छुपा है। हमें आशा है यह दोहे आपको बहुत पसंद आएंगे और आप इनसे प्रेरणा लेकर इन्हे अपने जीवन में उतारेंगे।

संत तुलसीदास के दोहो पर आपके विचार हमें Comment में ज़रूर बताये और इसे अपने दोस्तों के साथ शयेर ज़रूर करें।

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