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Simon Commission In Hindi – साइमन कमीशन की पूरी जानकारी।

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Simon Commission भारतीयों की एकता से आजादी की जीत का एक मुख्य भाग है। साइमन कमीशन 7 अंग्रेज़ सदस्यों का समूह था, इसका गठन ब्रिटिश सरकार द्वारा किया गया था। साइमन कमीशन को भारत की तत्कालीन उत्तरदायी सरकार के द्वारा किये गये संवैधानिक सुधारों (Constitutional Reforms) का अध्ययन कर एक रिपोर्ट तैयार करने, ज़रूरी सुझाव देने और सुधार करने के उद्देश्य से लाया गया था।

भारत में इस आयोग का कड़ा विरोध इसके प्रतिनिधिओं के चुनाव के समय से ही किया जाने लगा था। ‘Simon Go Back (साइमन वापस जाओ)’ का प्रसिद्ध नारा भी इसी आयोग के लिए दिया गया था। भारत के पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की शहीदी की कहानी भी साइमन कमीशन की जंग से जुड़ी हुई है, जिसने Simon Commission के प्रति विरोध को गति दी।

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Simon Commission in Hindi के बारे में जानना हर भारतीय के लिए आवश्यक है। साथ ही यह उनके लिए भी लाभकारी है जो UPSC, Civil Service Exams या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है। इस आर्टिकल में Simon Commission Kya Tha, Simon Commission Bharat Kab Aaya, इसका विरोध क्यों किया गया, आदि सम्पूर्ण जानकारी बिंदुओं के माध्यम से दी गयी है जिससे आपको समझने और याद करने में आसानी होगी।

Simon Commission

Simon Commission Kya Hai

ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाये गए भारत सरकार अधिनियम 1919 जिसे अंग्रेजी में Govt. of India Act 1919 (or Montague Chelmsford Reformation 1919) के नाम से जाना जाता है, उसमें एक प्रावधान ऐसा था जिसके अनुसार 10 साल के बाद भारत की संवैधानिक प्रगति का अध्ययन करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाना था। उसी के तहत भारतीय सांविधिक आयोग या साइमन कमीशन (Indian Statutory Commission or Simon Commission) का गठन किया गया था।

  • Simon Commission 7 ब्रिटिश सदस्यों का समूह था।
  • साइमन आयोग के अध्यक्ष Sir John Simon (सर जॉन साइमन) थे, जिनके नाम पर इसका नाम Simon Commission पड़ा।
  • Simon Commission का मुख्य कार्य भारत की संवैधानिक प्रगति यानी सरकारी व्यवस्था, शिक्षा एवं अन्य मुद्दों का अध्ययन (study) कर एक रिपोर्ट तैयार करना था। साथ ही, उसमें भारत के विकास से सम्बंधित ज़रूरी सुधार और सुझाव दिए जाने थे।
  • 10 साल होने से पहले ही यानी 1930 से पहले ही 8 नवंबर 1927 को Simon Commission का गठन करने की घोषणा कर दी गयी थी। ब्रिटिश सरकार का कहना था कि भारतीयों की मांगों के अनुसार शासन में जल्द सुधार लाने के उद्देश्य से आयोग की नियुक्ति समय से पहले की गयी।
  • Simon Commission के प्रतिनिधियों की नियुक्ति की खबर से ही भारत में इसका विरोध शुरू हो गया था। भारत की प्रगति के लिए बनाये गये इस साइमन कमीशन में एक भी भारतीय का न होना विरोध का मुख्य कारण था।

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7 Members Of Simon Commission

7 सदस्य साइमन आयोग में ब्रिटेन के तीन प्रमुख राजनीतिक दलों- ‘कंजर्वेटिव, लिबरल और लेबर’ के प्रतिनिधि शामिल थे। नीचे उनके और उनकी पार्टी के नाम दिए गये हैं।

  1. सर जॉन साइमन (लिबरल पार्टी)
  2. क्लेमेंट एटली (लेबर पार्टी)
  3. हैरी लेवी-लॉसन (लिबरल यूनियनिस्ट पार्टी)
  4. सर एडवर्ड सेसिल जॉर्ज काडोगन (कंज़र्वेटिव पार्टी)
  5. वर्नन हार्टशोम (लेबर पार्टी)
  6. जॉर्ज रिचर्ड लेन (कंजर्वेटिव पार्टी)
  7. डोनाल्ड स्टर्लिन पामर होवार्ड

Simon Commission का विरोध क्यों किया गया?

भारत में साइमन कमीशन का विरोध किये जाने के निम्नलिखित कारण है-

➤ Simon Commission में 7 सदस्य थे, जिनमे से एक भी भारतीय नहीं था, सभी अंग्रेज थे। इसी कारण भारतीयों ने साइमन कमीशन को व्हाइट मैन कमीशन (White Man Commission) नाम दिया था। ब्रिटिश सरकार का कहना था कि Simon Commission को अपनी रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को देनी है, इसलिए इसमें किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया।

भारतीयों के लिए ब्रिटिश सरकार का ये स्पष्टीकरण सिर्फ एक छलावा था, क्योंकि उस दौरान दो भारतीय ‘लॉर्ड सिन्हा’ और ‘मि. सकलातवाला’ ब्रिटिश संसद के सदस्य थे।

➤ Simon Commission की रिपोर्ट तैयार करते वक़्त महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, जिन्ना, जैसे प्रसिद्ध राजनेताओं को इससे बहार रखा गया था, और उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया था। इसे भारतीयों के साथ अन्याय और अपमान के रूप में देखा गया।

भारतीयों का मानना था कि, उनकी भलाई के लिए सही फैसला कोई ऐसा ही कर सकता है जो हर भारतीय की मुसीबत को समझता हो। भारतीयों की भलाई के लिए अंग्रेजों का कमीशन बनाना और उसमें एक भी भारतीय को शामिल न करना भारत के लोगों का अपमान समझा गया।

Simon Commission के लड़ाई में कौन-कौन साथ था?

इन पार्टियों ने किया था Simon Commission in India का पूर्ण बहिष्कार-

  • गाँधी, नेहरु और कांग्रेस: 1927 में मद्रास में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, उसके अध्यक्ष श्री एम.एन. अंसारी थे, जिसमें सर्वसम्मति से साइमन कमीशन के बहिष्कार का फैसला लिया गया।
  • मुस्लिम लीग
  • हिन्दू महासभा
  • किसान-मजदूर पार्टी
  • लिबरल फेडरेशन
  • केन्द्रीय विधानसभा ने भी इसका विरोध किया।

Simon Commission का समर्थन किसने किया था?

  • सर मोहम्मद शफी के नेतृत्व में मुस्लिम लीग के एक वर्ग ने कमीशन का समर्थन किया।
  • मद्रास की जस्टिस पार्टी
  • पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी
  • B. R. Ambedkar ने भी कमीशन का स्वागत किया था।

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Simon Commission Bharat Kab Aaya Tha

साइमन कमीशन भारत में 3 फरवरी 1928 को बम्बई के बंदरगाह पर उतरा था। भारत में आते ही उसे कड़े विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। Simon Commission का स्वागात उस दिन हड़ताल, ‘Simon Go Back’ (साइमन वापस जाओ), ‘Go Simon Go’ (जाओ साइमन जाओ) के नारों से किया गया। लाला लाजपत राय ने ‘Simon Go Back’ का नारा दिया था।

कोलकाता, लाहौर, लखनऊ, विजयवाड़ा और पुणे सहित जहाँ-जहाँ भी Simon Commission गया, उसे काले लहराते बहिष्कार के झंडों के साथ ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा।

’साइमन कमीशन कब भारत आया’ इस मुद्दे पर गौर करना ज़रूरी है क्योंकि इसके आगमन से ही भारत में विरोध अपने चरम पर पहुँच गया था।

साइमन कमीशन को भारत में समय से पहले क्यों लाया गया?

वैसे तो ब्रिटिश सरकार का कहना था कि, भारतीयों की मांगों के अनुसार शासन में जल्द सुधार लाने के लिए आयोग की नियुक्ति समय से पहले की गयी। परन्तु वास्तविक कारण कुछ और थे और उन कारणों को समझने के लिए Simon Commission Bharat Kab Pahuncha इस पर गौर करना ज़रूरी है-

✦ Simon Commission की नियुक्ति उस दौरान की गयी, जब भारत में एकता कमज़ोर हो रही थी और सांप्रदायिक दंगें ज़ोर पर थे। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि, यह आयोग भारत के लोगों के सामाजिक और राजनीतिक जीवन के विषय में नकारात्मक विचार लेकर लौटे जिससे भारत की छवि नकारात्मक रूप में प्रस्तुत की जाए।

✦ 1929 में ब्रिटेन में चुनाव होने वाले थे। वहां की तत्कालीन पार्टी (लिबरल दल) को मजदुर दल से हारने का भय था। वह नहीं चाहती थी कि, भारतीय समस्या को सुलझाने का मौका मजदुर दल को मिले।

✦ भारत में उस दौरान स्वराज दल के द्वारा सुधार की ज़ोरदार माँग की जा रही थी, इसको रोकने के लिए साइमन कमीशन को समय से पूर्व लाया गया था।

✦ उस दौरान जवाहर लाल नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में युवा आंदोलन भी उभर रहा था।

साइमन कमीशन के बहिष्कार पर ब्रिटिश शासन का प्रहार (लाला लाजपत राय का निधन)

साइमन आयोग के भारत आने पर कड़ा विरोध जताया जा रहा था। जगह-जगह आंदोलन, काले लहराते झंडे और नारों की गूँज थी। ब्रिटिश शासन हर मुमकिन प्रयास कर रहा था Simon Commission के खिलाफ उठती आवाजों को रोकने का। उसने विरोध को बढ़ता देख आन्दोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना शुरू कर दिया था जिसमें कई लोग घायल हुए, कई लोगों ने जान गवाई।

★ लखनऊ में लाठीचार्ज के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरु घायल हो गये थे, गोविन्द वल्लभ पन्त अपंग हो गये थे।

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★ 30 अक्टूबर 1928 को साइमन कमीशन जब लाहौर का दौरा करने पहुंची, तब वहां लाला लाजपत राय ने इसके विरोध में एक अहिंसक मार्च का नेतृत्व किया और “Simon Go Back” का नारा दिया। वहां प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाये और झंडे लहराए।

जिसको रोकने के लिए लाहौर के पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज का आदेश दिया, और उप अधीक्षक सांडर्स जनता पर लाठी लेकर टूट पड़ा। स्कॉट ने स्वयं व्यक्तिगत रूप से राय पर निर्ममता से लाठियाँ बरसाई थी।

★ गंभीर रूप से घायल लाला लाजपत राय ने बाद में भीड़ को संबोधित करते हुए, यह घोषणा की थी- “आज मेरे ऊपर बरसी हर एक लाठी अंग्रेजों की ताबूत की कील बनेगी”। 63 वर्षीय राय का 17 नवंबर 1928 को गंभीर चोटों के कारण निधन हो गया था।

★ देशवासियों के लिए लाला लाजपत राय की मृत्यु एक बड़ा झटका थी। इस घटना के कारण लोग इतने क्रोध में थे की पूरे देश में हिंसा का भयानक माहौल छा गया था। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुख देव, राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त आदि क्रांतिकारियों ने राय की निर्मम हत्या का बदला लेने के लिए स्कॉट को मौत के घाट उतारने की योजना बनाई।

★ 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स को स्कॉट समझकर राजगुरु ने उसे गोलियों से छन्नी कर दिया और भगत सिंह ने उसके सर पर कई गोलियां चलाई, जिससे उसकी मृत्यु हो गयी।

★ इस बढ़ते हिंसक विरोध के चलते तत्कालीन वाइसराय लार्ड इरविन ने महात्मा गाँधी को गोल मेज़ कॉन्फ्रेंस के ज़रिये ये भरोसा दिलाया कि, साइमन आयोग की रिपोर्ट में भारतीयों की मांगों का ध्यान रखा जायेगा।

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साइमन कमीशन के सुझाव (Recommendations Of Simon Commission)

Simon Commission को रिपोर्ट बनाने में 2 साल से अधिक का समय लगा। 27 मई 1930 में साइमन आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित की गयी। आयोग द्वारा दिए गये सुझाव कुछ इस प्रकार हैं-

✦ भारत सरकार अधिनियम 1919 (Government of India Act 1919) के तहत लागू किये गये द्वैध शासन व्यवस्था (Diarchy System) को समाप्त कर उत्तरदायी शासन की स्थापना की जाए। रिपोर्ट में कहा गया की द्वैध शासन अनेक आंतरिक दोषों और भारतीय दंगों के कारण सफल नहीं हो सकता।

✦ देश का प्रभावी रूप से शासन करने के लिए एक संघीय तथा लचीले संविधान का निर्माण किया जाना चाहिए।

✦ केंद्र में उत्तरदायी सरकार का गठन करने का उचित समय अभी नहीं आया है इसलिए उसका गठन न किया जाए।

✦ केंद्रीय विधान मंडल (विधान सभा और विधान परिषद) का दोबारा गठन किया जाए और उसमें संघीय भावना का पालन किया जाए। केन्द्रीय विधान मंडल के सदस्यों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से प्रांतीय विधान मंडलों द्वारा किया जाए।

✦ प्रान्तीय विधानमण्डलों (Provincial Assemblies) का विस्तार किया जाए। उनके सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से किया जाए।

✦ बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भारत से तथा सिंध को बम्बई से विलग (Separate) किया जाए। उड़ीसा को अलग प्रांत का दर्जा दिया जाए।

✦ उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत के पिछड़े होने के कारण उसे अभी प्रांतीय स्वशासन न दिया जाए।

✦ भारत सरकार के नियंत्रण में उच्च न्यायालय को रखा जाए।

✦ भारत मंत्री को राय देने के लिए भारत परिषद् को बरकरार रखा जाए, साथ ही उसकी शक्तियों में कुछ कमी की जाए।

✦ अल्पसंख्यक जातियों के हितों के लिए गवर्नर और गवर्नर जनरल को विशेष शक्तियां प्रदान की जाए।

✦ सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को पूर्ववत जारी रखा जाए।

✦ 1926 के दौरान मताधिकार भारत में 2.8 प्रतिशत था, इसे बढ़ाकर 10 प्रतिशत आबादी को मत का अधिकार दिया जाए।

✦ प्रति 10 वर्ष के बाद एक संविधान आयोग (Constitution Commission) की नियुक्ति की व्यवस्था को समाप्त किया जाए।

इस प्रकार साइमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय राजनीती की समस्त कठिनाइयों और समस्याओं पर प्रकाश डाला। लेकिन उसने तत्कालीन भारत और जनता की आकांक्षाओं और अभिलाषाओं की अपेक्षा की।

साइमन कमीशन का भारत पर क्या असर पड़ा? (Impact Of Simon Commission)

चौरी-चौरा घटना (4 फरवरी, 1922) के बाद गाँधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने से भारत की आजादी की लड़ाई शिथिल और दिशाहीन पड़ गयी थी। उसे Simon Commission के प्रतिनिधियों की नियुक्ति की खबर से दिशा और रफ़्तार मिली।

साइमन आयोग की कड़ी आलोचना के बावजूद उसकी रिपोर्ट की सिफारिशों को कुछ संशोधनों के साथ 1935 के भारत सरकार अधिनियम में स्वीकार किया गया। इस प्रकार Simon आयोग की रिपोर्ट 1935 के भारत सरकार अधिनियम का आधार बनी।

Simon Commission से जुड़े FAQs

  • साइमन कमीशन भारत कब आया था?

3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन भारत आया था।

  • साइमन कमीशन का गठन क्यों किया गया था?

भारत सरकार अधिनियम 1919 के एक प्रावधान के अनुसार 10 साल बाद एक आयोग का गठन किया जाना था, उसी के तहत साइमन आयोग का गठन किया गया था। साइमन कमीशन का उद्देश्य भारत की तत्कालीन उत्तरदायी सरकार के द्वारा किये गये संवैधानिक सुधारों (Constitutional Reforms) का अध्ययन कर एक रिपोर्ट तैयार करना और ज़रूरी सुझाव-सुधार देना था।

  • Simon Commission का अर्थ क्या होता है?

साइमन कमीशन ब्रिटिश संसद के 7 अंग्रेज़ सदस्यों का समूह था। भारत में संवैधानिक सुधारो के अध्ययन के लिए इसका साइमन कमीशन का मूल रूप से नाम भारतीय संविधान आयोग (Indian Statutory Commission) था। इस आयोग के अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे, इसलिए इसको साइमन कमीशन नाम से संबोधित किया जाने लगा। भारत में इस कमीशन को ‘श्वेत कमीशन’ नाम से भी जाना जाता है।गठन वर्ष 1927 में किया गया था। साइमन कमीशन का नाम इसके अध्यक्ष सर जॉन Simon के नाम पर पड़ा था।

  • साइमन कमीशन भारत कब आया, कितनी बार आया और उस समय वाइसराय कौन था?

वर्ष 1927 में साइमन कमीशन का गठन किया गया था। 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन पहली बार भारत आया था। साइमन कमीशन कुल 2 बार भारत आया था। उस समय लॉर्ड इरविन भारत के वाइसराय थे।

  • साइमन कमीशन का दूसरा नाम क्या है?

साइमन कमीशन का मूल रूप से नाम भारतीय संविधान आयोग (Indian Statutory Commission) था। इस आयोग के अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे, इसलिए इसको साइमन कमीशन नाम से संबोधित किया जाने लगा। भारत में इस कमीशन को ‘श्वेत कमीशन’ नाम से भी जाना जाता है।

Conclusion

आज के इस लेख में हमने आपको फैक्ट्स के आधार पर Simon Commission के बारे में जानकारी देने की पूरी कोशिश की है। आशा है, अब आप जान गए होंगे कि, साइमन कमीशन क्या है, Simon Commission Kab Bharat Aaya, किस उद्देश्य से आया, उसने अपनी रिपोर्ट में क्या प्रस्ताव पेश किए और उसका भारत पर क्या प्रभाव पड़ा। उम्मीद है Simon Commission In Hindi ब्लॉग में दी गयी जानकारी आपके लिए उपयोगी साबित हुई होगी।

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